शीशे का एक महल तुम्हारा,
शीशे का एक महल हमारा.
फिर पत्थर क्यों हाथों में
आओ मिल बैठें , ना घात करें ।
प्रीत भरें बीतें लम्हों को ,
नवदीप जलाकर याद करें......
शीशे का एक महल हमारा.
फिर पत्थर क्यों हाथों में
आओ मिल बैठें , ना घात करें ।
प्रीत भरें बीतें लम्हों को ,
नवदीप जलाकर याद करें......
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