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आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

जब से आये हो जिंदगी में मेरे चमन को बहारो का मतलब याद आया दिल कहे, जीवन की ये बगिया तेरे नाम कर दूँ ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ पूछे है पगली, याद करते हो मुझे कैसे कहू, हर शब्-ओ-सहर तेरी याद में डूबे है हर वक़्त जो दिल धडके है तेरी खातिर, उसकी हर शाम तेरे नाम कर दूँ ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ हर सुबह का आगाज़ तुम्ही से हर शाम तेरे नाम से ढले हर जाम से पहले कहू ‘बिस्मिल्लाह’,हर वो जाम तेरे नाम कर दूँ ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ वो रोये है तो बरसे है बादल इधर भी हँसे है तो खिले है फूल इधर भी तेरी हर मुस्कराहट पर,ये मेरी जान तेरे नाम कर दूँ ले, आज फिर एक कविता तेरे नाम कर दूँ

मै सोता रहा तेरी यादों के चराग जला कर

मै सोता रहा तेरी यादों के चराग जला कर, लगा गयी आग एक हलकी सी हवा आ कर, इसे मेरी बदनसीबी नहीं तो और क्या कहोगे, प्यासा रहा मै दरि या के इतने पास जा कर, आज जब तेरी पुरानी तस्वीरों को पलटा मैंने, हंसती है कैसे देखो ये भी मुझे रुला कर, किस्मत ने दिया धोखा और खो दिया तुझे, क्या करूँगा मै अब सारा जहाँ पा कर, दिल की गहराइयों मे कितने उतर गए हो तुम, कोई देख भी नहीं सकता उतनी गहराइयों मे जा कर, जब तुमने कहा मुझसे के मेरे नहीं हो तुम, लगा जैसे मौत चली गयी हो मुझको गले लगा कर.....

उड़ान

मंजिले उन्हें ही मिलती है जिनके सपनो में जान होती है पंखों से कुछ नही होता, हौसलों से उड़न होती है मंजिल तो मील ही जाएगी भटक कर ही सही गुमराह तो वो है जो घर से निकले ही नहीं .....

अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं !!!

कहाँ थी कमी, और कहाँ था वक़्त, तेरे आने से पहले तेरे चक्कर में ऐ जान-ऐ-जाना, अब काम से वक़्त चुराने लगा हूं … ये कैसा सितम काफिर तेरा मेरे मोबाइल पर कही बुझ न जाये ये चिराग, अब चार्जर भी साथ लेकर आने लगा हूं आनी है दिवाली और दिल सफाई शुरू हुयी मेरे दिल की चली न जाये बत्ती, तुझे दिल में जलाने लगा हूं तेरे बदन से जो खुशबु महके और शमा रंगीन हो कुछ तो भला किया तुने सनम,अब डीओडोरेंट के पैसे बचाने लगा हूं तेरी बातो से फुर्सत कहा और तेरी यादो से वक़्त जी भर के देखू तुझे,इसलिए अब वीकएंड पर भी नहाने लगा हूं अब न कहना के बहुत अमीरी है तेरे मिलने में यहाँ लुट चुका हूं मैं , बस कड़ी कोशिश से गरीबी छुपाने लगा हु मेरी कविता इतनी फर्जी भी होगी,सोचा न था देख तेरी मोहब्बत में मैं,क्या क्या क्या क्रेप गाने लगा हूं 

वो बचपन की यादें आज भी तन्हाई मे खोजता हूँ मै

वो बचपन की यादें आज भी तन्हाई मे खोजता हूँ मै गुम हो जाता हूँ खुद मे जब उसके बारे मे सोचता हूँ मै नए साल पे दोस्तों के साथ क्या पिकनिक खूब मनाई थी छोटे परदे पे बड़ी फ़िल्मी देख के जलेबियाँ खूब खाई थी क्रिकेट खेलने की तो हर पल होती हमारी तैयारी थी कितने डंडे खाए पापा चाचा से उफ़ फिर भी क्या बेकरारी थी दोस्तों की मण्डली निकलती थी साथ साथ हर होली मे सुबह पिचकारियों मे रंग होता शाम गुलाल भरा होता झोली मे दशहरे की तो बात जुदा थी वो मेला कितना प्यारा था मंदिर के पीछे चोर सिपाही,लुका-छुपी उफ़ वो वक़्त हमारा था दीवाली के पटाखे देखकर खुशियों मे पर लग जाते थे कर के परेशान मोहल्ले मे सबको यंहा वंहा पटाखे बहुत जलाते थे बीता बचपन गुज़रा जमाना अब यादों में खुश हो लेने दो न जाने क्यूँ दिल है मेरा जी भर के आज मुझे रो लेने दो... क्यूँ इन नज़रों को उसका इंतज़ार आज भी है

कुछ अश‍आर ( Kuch Ashaar) - राम प्रसाद 'बिस्मिल' (Ram Prasad 'Bismil'),

इलाही ख़ैर वो हरदम नई बेदाद करते हैँ हमेँ तोहमत लगाते हैँ जो हम फरियाद करते हैँ ये कह कहकर बसर की उम्र हमने क़ैदे उल्फत मेँ वो अब आज़ाद करते हैँ वो अब आज़ाद करते हैँ सितम ऐसा नहीँ देखा जफ़ा ऐसी नहीँ देखी वो चुप रहने को कहते हैँ जो हम फरियाद करते हैँ

पीने पिलाने के सब हैं बहाने

कहाँ  की  मुहब्बत  कहाँ  के  फ़साने पीने  पिलाने  के  सब  हैं  बहाने ख़ुशी  में   भी   पी  है तू  ग़म  में  भी  पी  है हैं  मस्ती  भरे  ये  मैखाने  के  पैमाने  ...पीने  पिलाने  के  सब  हैं  बहाने सताए  न  हमको  कभी  याद  इ  माजी चलो  भूल  जाएँ  वो  गुज़रे  ज़माने पीने  पिलाने  के  सब  हैं  बहाने चलो  अब  तू  गुमनाम  एस  मैखाने  से तुम्हें  दफन  करने  हैं  सब  ग़म  पुराने पीने  पिलाने  के  सब  हैं  बहाने .. सब  हैं  बहाने