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एक तमन्ना और सही


प्यार का ये बुखार क्यूँ चढ़ने लगा है,
उतर गया था नशा तो क्यूँ बढ़ने लगा है,
मासूमियत उसके चेहरे की क्यूँ सताने लगी है,
आज फिर से इतना प्यारा कोई क्यूँ लगने लगा है.
रातों मे उसकी हसीं याद  क्यूँ आने लगी है,
सदियों से फैली ये उदासी चेहरे से जाने लगी है,
इतना प्यारा भला कोई हो भी सकता है,
खुशियाँ शायद फिर से मुझे गले लगाने लगी है.
आँखों मे उसके अपनी तस्वीर सजाना चाहता हूँ,
खुद को उसके मुस्कान की वजह बनाना चाहता हूँ,
होंठो से भले नाम लिया हो मेरा अनजाने मे,
मे बस उसी एक पल मे खो जाना चाहता हूँ.
उसकी हर एक अदा प्यारी लगने लगी है,
दिलो दिमाग पर एक खुमारी चढ़ने लगी है,
देख के उसको सारी थकान उतर सी जाती है,
उसको हर एक पल देखने की बेकरारी बढनें लगी है.
उसकी शरारतें मेरे दिल को बहुत ही भाती हैं,
आहटें उसकी सुनकर ये हवाएं थम सी जाती है,
भीड़ मे भी वो ही वो क्यूँ दिखें मुझे,
आँखें हो बंद तो दबे पाँव ख़्वाबों मे चली आती है.
खुशबू उसकी मेरे मन को महका रही है,
नजाकत उसकी मेरे धड़कनों को बहका रही है,
जुल्फें जो बिखरा ली हैं उसने अपने कंधों पर,
जैसे चाँद को बादलों मे से ले के आ रही है.
तेरी अदाओं मे नादानी का बहाना है,
तुझे बना के ग़ज़ल अपने होंठों पे गुनगुनाना है,
तेरे साये के अहसास से ही मचल जाता हूँ मे,
वो महफ़िल कितनी खूबसूरत होगी जंहाँ तेरा जाना है.

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