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फिर भी दिल को उसके लिए बेक...अरार क्यूँ करता हूँ

यंहा  उसका  मेरा  होना  मुमकिन  ही  नहीं,

फिर  भी  उससे  प्यार  क्यूँ  करता  हूँ,

जिन  राहों  पर  बन  नहीं  सकते  उसके पावों  के निसान,

उनपर  पलकें  बिछाये  उसका  इन्तेजार  क्यूँ  करता  हूँ,

उससे  मेरे  प्यार  का  किसी  से  इज़हार  ना कर  पाऊ,

फिर  बार  बार  खुद  से  ये  इकरार  क्यूँ  करता  हूँ,

और  उसे  भी   इल्म  ना होगा  मेरे  प्यार  का, 

फिर  भी  दिल  को  उसके लिए  बेक...अरार  क्यूँ  करता  हूँ.



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