क्यूँ ढूंढता उस ख्वाब को के कौन जाने किधर गया
जो पास है उसे साथ रख जो गुज़र गया सो गुज़र गया
अपना समझ जिसे खुश हुआ अहसास समझ कर भूल जा
बस नशा था थोड़ा प्यार का सुबह हुई तो उतर गया
...उस शख्स का भी क्या कसूर था जो पास होकर भी दूर था
ये तो ज़माने का दस्तूर है वो भी ज़माने संग बदल गया
न रखना दिल मे यादों को और ना आँखों को रोने देना
झोंका था बस एक हवा का आया और छु के निकल गया
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